गुर्दा मरीजों की सांस फूलने पर जरूरी नहीं कोरोना हो


 


 


लखनऊ। यदि गुर्दा मरीजों को सांस लेने में तकलीफ है, तो यह जरूरी नहीं की इनमें कोरोना वायरस ही है। एक माह के भीतर पीजीआई में डायलिसिस कराने आये दो दर्जन से अधिक गुर्दा मरीजों में सांस लेने की तकलीफ थी। डॉक्टरों ने पहले इनकी कोरोना संक्रमण की जांच करायी। सबकी रिपोर्ट निगेटिव आई है। इंडियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के सचिव व पीजीआई नेफ्रोलॉजी विभाग के डॉ. नारायण प्रसाद बताते हैं कि गुर्दा मरीजों में सांस लेने की तकलीफ नियमित डायलिसिस न होने की वजह से थी। वह बताते हैं कि निर्धारित समय पर डायलिसिस न होने पर फेफड़े और दिल के साथ ही शरीर के अन्य अंगों में पानी इकट्ठा होने लगता है। इससे मरीजों को सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। सांस फूलने जैसे लक्षण प्रतीत होते हैं। यह लक्षण कोरोना से मेल खाते हैं। लिहाजा गुर्दा मरीज इसे कोरोना समझ घबरा जाते हैं। 30 प्रतिशत संक्रमण का अधिक खतरा : डॉ. नारायण प्रसाद बताते हैं कि गुर्दा मरीजों में कोरोना वायरस का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक होती है। गुर्दा मरीजों को यदि सांस फूलने के अलावा नाम के बजाय को वा बुखार, जुखाम और खांसी जैसे लक्षण प्रतीत होने पर तुरंत कोरोना संक्रमण की जांच कराये। यहां रोजाना करीब 100 डायलिसिस हो रही हैं। मरीज पेरिटोनियल डायलिसिस को अपनाएं: पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. अमित गुप्ता बताते हैं कि कोरोना संक्रमण के चलते पेरिटोनियल डायलिसिस (पीडी) सबसे सुरक्षित है। इसकी वजह से मरीजों को लॉकडाउन में भागदौड़ से निजात मिलेगी और अस्पताल के संक्रमण से बचाव भी होगा। पेरिटोनियल डायलिसिस ऐसी थेरेपी है। जिसे कोई भी सीख कर घर पर कर सकता है। इस थेरेपी में एक माह में करीब 22 हजार का खर्च आता है।